Tuesday, 17 September 2019

गांगुली पर है इन 5 खिलाड़ियों का करियर खत्म करने का आरोप, अपनी कप्तानी में नहीं दिया मौका

सौरव गांगुली का भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक विशेष स्थान है। कोलकाता में जन्मे क्रिकेटर भारत के सबसे सफल और प्रभावशाली कप्तानों में से एक थे। उन्होंने भारतीय क्रिकेट में क्रांति का नेतृत्व किया। गांगुली की कप्तानी में ही भारत ने पूरी तरह से अलग ब्रांड का क्रिकेट खेलना शुरू किया था।
कोलकाता के बाएं हाथ के खिलाड़ी ने पांच साल तक भारत का नेतृत्व किया और इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। उन्होंने दो प्रारूपों (टेस्ट और वनडे) में 200 से अधिक मैचों में कप्तानी की और अच्छी सफलता हासिल की। गांगुली की आक्रामक कप्तानी शैली थी और वह अपने खिलाड़ियों को समर्थन देना पसंद करते थे।
उन्होंने काफी युवा खिलाड़ियों का समर्थन किया। युवराज सिंह, मोहम्मद कैफ, जहीर खान, आशीष नेहरा, हरभजन सिंह और एमएस धोनी, गांगुली के समर्थन का आनंद लेने वालों में से थे। हालाँकि, कुछ ऐसे खिलाड़ी भी थे जो कप्तान के रूप में गांगुली के शासनकाल के दौरान टीम में जगह नहीं बना सके। इसलिए, यहां उन 5 खिलाड़ियों की सूची दी गई है, जिनके करियर को खत्म करने का आरोप गांगुली पर है।
1. वसीम जाफर

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वसीम जाफर भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे अनलकी खिलाड़ियों में से एक हैं। दाएं हाथ के सलामी बल्लेबाज ने घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बनाए हैं और फिर भी, उन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया। उन्होंने 1996-97 सीज़न में मुंबई के लिए अपनी प्रथम श्रेणी और लिस्ट 'ए' क्रिकेट की शुरुआत की।
रणजी ट्रॉफी में शानदार प्रदर्शन करने के बाद, जाफर ने 2000 में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया, लेकिन प्रभावित करने में असफल रहे। वह 2002 में वापस आए थे जब भारत ने वेस्टइंडीज और इंग्लैंड का दौरा किया था। हालांकि, उन्होंने नौ पारियों (पांच टेस्ट मैचों) में 215 रन बनाए।
उनका असंगत प्रदर्शन टीम से उनके बहिष्कार का कारण बना। एक ऐसा समय था जब जाफर ने गांगुली के नेतृत्व में 2006 में वापसी की और तीन साल तक टेस्ट टीम का हिस्सा रहे। लेकिन, गांगुली के नेतृत्व में भारत ने काफी सलामी बल्लेबाजों को मौके दिए, लेकिन घरेलू क्रिकेट में बहुत रन बनाने के बावजूद उन्होंने कभी जाफर को मौके नहीं दिए।
इस प्रकार, जाफर घरेलू क्रिकेट में खेलने के लिए मजबूर हो गए और उन्होंने कभी निराश नहीं किया। उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 51.19 की औसत से 19,000 से अधिक रन बनाए हैं।
2. दिनेश कार्तिक

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जब एमएस धोनी भारतीय टीम में आए, उससे पहले लगभग चार साल तक, भारत विकेटकीपरों की कमी से जूझ रहा था। धोनी से पहले, सभी प्रारूपों में सौरव गांगुली ने 10 विकेटकीपरों को मौका दिया और उनमें से एक दिनेश कार्तिक थे।
तमिलनाडु का विकेटकीपर सिर्फ 19 साल का था, जब उन्होंने 2004 में लॉर्ड्स में एकदिवसीय मैच में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया। उन्होंने उस साल के अंत में जल्द ही अपना टेस्ट डेब्यू किया। उन्होंने भारत के पहले टेस्ट विकेटकीपर के रूप में नौ टेस्ट मैच खेले, जिसके बाद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया।
कार्तिक टेस्ट प्रारूप में प्रदर्शन करने में विफल रहे क्योंकि उन्होंने लगातार अच्छी शुरुआत को बड़े स्कोर में बदलने में नाकामी हासिल की। हालाँकि, एकदिवसीय क्रिकेट में, कार्तिक को सिर्फ दो मैचों के बाद बाहर दिया गया था। जिसके बाद धोनी ने डेब्यू किया और कार्तिक के लिए टीम इंडिया के दरवाजे बंद हो गए।
इस प्रकार, कार्तिक को गांगुली के अधीन ज्यादा मौके नहीं मिले, गांगुली ने कभी भी तमिलनाडु के खिलाड़ी का समर्थन नहीं किया।
3. आकाश चोपड़ा

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सौरव गांगुली की कप्तानी, विकेटकीपर की कमी थी, साथ ही टेस्ट क्रिकेट में सलामी बल्लेबाज का स्लॉट भी खाली था। वीरेंद्र सहवाग 2002 के बाद से लगातार सलामी बल्लेबाजों में से एक थे। गांगुली के नेतृत्व में सदगोपन रमेश को मौके मिले, लेकिन अन्य खिलाड़ियों में से किसी को भी ज्यादा मौके नहीं दिए गए।
पांच साल की अवधि (2000-2005) में आजमाए गए 14 टेस्ट सलामी बल्लेबाजों में से आकाश चोपड़ा भी एक थे। उन्होंने गांगुली के नेतृत्व में छह टेस्ट मैच खेले और 22.00 की औसत से 264 रन बनाए।
हालांकि, चोपड़ा के पास एक ठोस तकनीक थी। हालांकि, उन्होंने कोई बड़ा स्कोर नहीं बनाया, लेकिन आउट होने से पहले वह औसतन 62 गेंद खेल रहे थे। इसलिए, वे नई गेंद को पुराना कर रहे थे। इसके अलावा, उन्होंने घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन कुछ विफलताओं के बाद, चोपड़ा को बाहर कर दिया गया और 2004 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ घर पर श्रृंखला के बाद टीम में कभी वापस नहीं लौटे।
4. रमेश पोवार

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रमेश पोवार भले ही सबसे फिट क्रिकेटर न रहे हों, लेकिन मैदान पर बहुत महनत करते थे। उनकी गेंदबाजी बहुत प्रभावी थी और वह घरेलू क्रिकेट में मुंबई के लिए लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों में से एक थे।
उन्होंने 1999-2000 सीज़न में प्रथम श्रेणी में पदार्पण किया, जबकि उन्होंने अगले सीज़न में अपनी सफ़ेद गेंद क्रिकेट की शुरुआत की। हालांकि, वह जल्द ही सुसंगत हो गए और मुंबई टीम का अभिन्न अंग बन गए। इसलिए, घरेलू क्रिकेट में अच्छे प्रदर्शन के बाद, उन्हें 2004 में भारत के लिए डेब्यू का मौका मिला।
पोवार ने 2004 में पाकिस्तान में अपना वनडे डेब्यू किया। हालांकि, उन्होंने सिर्फ दो मैच खेले और दोनों में ही विकेट लेने असफल रहे। इसलिए, गांगुली की कप्तानी में उन्हें हरभजन सिंह और अनिल कुंबले की मौजूदगी के कारण अनदेखा कर दिया गया।
5. सुनील जोशी

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सुनील जोशी एक और क्रिकेटर हैं जो खुद को बहुत बदकिस्मत मान सकते हैं। कर्नाटक के बाएं हाथ के स्पिनर ने घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया और फिर भी उनकी अनदेखी की गयी। उन्होंने 1996 में अपने टेस्ट और एकदिवसीय दोनों डेब्यू किए और 1990 के दशक के अंत में वे राष्ट्रीय टीम में थे।
हालांकि, अनिल कुंबले के साथ हरभजन सिंह के उभरने के साथ, जोशी की अनदेखी शुरू हो गयी। सौरव गांगुली के नेतृत्व में, बाएं हाथ के स्पिनर ने दोनों प्रारूपों में सिर्फ 24 मैच खेले। उन्होंने उस अवधि के दौरान मिला-जुला प्रदर्शन किया और आखिरकार उन्हें टीम से निकाल दिया गया।
जोशी आखिरी बार 2001 में भारत के लिए खेले थे। हालांकि, उन्होंने इसके बाद लगभग एक दशक तक घरेलू क्रिकेट खेला। इस प्रकार, लगातार प्रदर्शन के बावजूद, जोशी कभी भी टीम में वापस नहीं आए। इसलिए, उन्हें मार्च 2001 के बाद उन्हें वापसी का कोई मौका नहीं मिला।