Tuesday, 17 September 2019

सौरव गांगुली के कप्तान बनते ही बदल गई टीम, डरकर खेलने वाले अचानक बन गए शेर, पढ़ें पूरी खबर


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नमस्कार मित्रों स्वागत है आपका क्रिकेट समरी में। आज दादा के नाम से मशहूर पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली का जन्मदिन है। आज हम आपको दादा के भारतीय क्रिकेट में योगदान को बताएंगे। वर्ष 2000 से पहले की भारतीय टीम में भी खिलाड़ी वही थे, नेतृत्व अलग था, हम जवाब नहीं देते थे, "ऐग्रेशन" नहीं दिखाते थे, शरीफाना ढ़ंग से खेलते थे, विदेशी दौरे में हमारे खिलाड़ी दबे दबे से रहते थे, फिर नेतृत्व आया कोलकाता से आए एक खिलाड़ी के हाथ में, जिसने बताया कि प्रदर्शन से जवाब देने के साथ-साथ मुँह से जवाब देना भी बहुत जरुरी है, किसी को सर पर चढ़ने नहीं देना है। थोड़े समय में ही टीम बदली बदली सी दिख रही थी, अंग्रेज स्लेजिंग का जवाब स्लेजिंग से पाकर थोड़े अकुलाए से थे। युवराज- हरभजन जैसे खिलाड़ियों की एंट्री हो चुकी थी जो गेंद और बल्ले से ठोकने के साथ साथ गाली का जवाब बड़ी वाली गाली से देने में सक्षम थे। सहवाग था जो शोएब अख्तर को खुद भी पीटता था, और उनके बाप से भी पिटवाता था।

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निर्भीकता की नींव डल चुकी थी, वो नींव अब और मजबूत हो चुकी है। किसी के बाप की मजाल जो विराट कोहली से स्लेजिंग कर ले। एक अच्छा नेतृत्व कई पीढ़ियाँ सुधार सकता है। दादा का भारतीय क्रिकेट में योगदान आंकड़ों से कहीं ज्यादा है, मैच फिक्सिंग स्कैण्डल के बाद से टीम को उठाया और उसके बाद शुरू हुए टेस्ट क्रिकेट के कुछ बेहतरीन साल, लॉर्ड्स की बालकनी से तौलिया पहने टीशर्ट लहराते दादा जोश में थे, हम यहाँ लिप रीडिंग कर रहे थे, ये माँ वाली ये बहन वाली।

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कुछ महीनों बाद 23 मार्च 2003 को वांडरर्स जोहानेसबर्ग में हम ऑस्ट्रेलिया से फाइनल खेल रहे थे, महीना भर पहले कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि ऐसा कुछ होगा, फाइनल हार गए पर ये साफ़ साफ़ दिखने लगा था कि टीम का भविष्य उज्जवल है। टीम में सूरज बड़जात्या फ्लेवर पहले से था, पर अनुराग कश्यप फ्लेवर भी जरुरी है ये समझाने वाले दादा ही थे। दादा को जन्मदिन की बम्पर बधाई..