Tuesday, 3 December 2019

मनीषा कोइराला के इस ट्वीट से पहले आंसू आते हैं, फिर दिल मुट्ठी में पकड़ी बर्फ सा पिघलने लगता है


मनीषा कोइराला. 1989 में रिलीज़ हुई नेपाली मूवी फेरी भेटौला (फिर भेंट होगी) से अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया. अगली मूवी हिंदी में थी. सौदागर. सुभाष घई की. 1991 की ब्लॉकबस्टर ये मूवी कुछेक ऐसी फिल्मों में से थी जिसका लीड एक्टर तो भीड़ में खो गया लेकिन एक्ट्रेस सफलता के नित नए मुकाम छूती रही. वरना अमूमन इसका उल्टा होता आया है.
एक्ट्रेस. मनीषा कोइराला. कुछ हिट, कुछ फ्लॉप कुछ औसत फ़िल्में देती रहीं और लगातार एक्टिव रहीं. बेशक कभी कम, कभी ज़्यादा. लेकिन फिर नवंबर 2012 में उन्हें ओवेरियन केंसर डिटेक्ट हुआ था. हालांकि 2014 में वो कैंसर फ्री हो गईं थीं लेकिन 2012 के बाद वो पांच साल बॉलीवुड से दूर रहीं. 2015 में उनकी एक अटकी हुई फिल्म ‘चेहरे’ रिलीज़ हुई. लेकिन वो पूरी तरह वापस लौटीं 2017 में. ‘डियर माया’ में अपने कैरेक्टर माया देवी के साथ. ये और इसके बाद के उनके रोल लगातार ‘क्रिटिकली एक्लेम्ड’ होने लगे. फिर चाहे वो नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज़ ‘लस्ट स्टोरी’ में रीना का किरदार हो या ‘संजू’ में नर्गिस का. उनकी एक और मूवी जो काफी समय से डब्बा बंद चल रही थी इस दौरान ही ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ हुई. नाम था- ‘दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश’. इसमें भी उन्होंने एक सिंगल मदर का किरदार बेहतरीन ढंग से निभाया था, जिसके घर एक गे रहने आ जाता है.

टेड एक्स में प्रभावी स्पीच देकर मनीषा कैंसर से लड़ रहे लोगों के लिए एक मिसाल बन गईं थीं. इसके अलावा भी उन्होंने कैंसर पीड़ितों के लिए कई कार्य किए और हमेशा ही जीवन को बेहतरीन ढंग से जीने के लिए लोगों को प्रेरित करती रहीं.
इसी क्रम में अब उन्होंने एक ट्वीट किया है. देखने में काफी इमोशनल सा लगने वाला ये ट्वीट करोड़ों कैंसर पीड़ितों के लिए एक और किरण सरीखा है.
Forever greatful for second chance to life 🙏🏻🙏🏻🙏🏻gm friends.. this is an amazing life and a chance to live a happy& healthy one 💖💖💖
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इस ट्वीट में एक तरफ उनके बीमारी के दिनों की तस्वीर है. दूसरी तरफ उनकी इस वक्त की तस्वीर. लेफ्ट वाली तस्वीर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़ल के एक मिसरे का मेनिफेस्टेशन है- लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है. और दूसरी गुलज़ार की एक लाइन की- ज़िंदगी फिर भी बड़ी खूबसूरत है.
इस ट्वीट के साथ मनीषा ने कैप्शन दिया है, जिसका सार कुछ यूं है-
गुड़ मॉर्निंग दोस्तो. ज़िंदगी की हमेशा शुक्रगुजार रहूंगी. उसने मुझे दूसरा मौका दिया. ये कमाल की ज़िंदगी है.

अगर मनीषा का ये बाउंस बैक, जीवन के प्रति उनका ये प्रेम ट्रैफिक जाम के इरिटेशन को, बॉस की डांट के फ्रस्टेशन को नहीं भुलवा देता, तो यकीनन हममें कोई न कोई दिक्कत है. जाते जाते एक बार ऊपर स्क्रॉल करके इन दोनों तस्वीरों को फिर से देखिएगा. सोचिएगा मनीषा या उन जैसे लोग कैसे उस अंधेरी गुफा से गुज़रे होंगे. सोचिए क्या चीज़ें होंगी जो तब उन्हें मोटिवेट करती होंगी….