Saturday, 8 February 2020

कीड़ा जड़ीः उत्तराखंड में पाई जाती है ये नायाब बूटी, रत्ती भर की कीमत 18 लाख रुपये


मई-जून के महीने में उत्तराखंड में पहाड़ के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ पिघलने के साथ ही घास के मैदानों में एक नायाब जड़ी की तलाश शुरू हो जाती है. इस पहाड़ी राज्य में पिथौरागढ़, चमोली, बागेश्वर, मुंसियारी व कुमाऊं की अन्य जगहों पर ग्रामीण लोग, जिसमें बच्चे भी होते हैं, इस बेशकीमती जड़ी की खोज शुरू कर देते हैं. इनकी नजरें घास में छिपे एक पीले-भूरे रंग की जड़ी पर होती हैं. दिन खत्म होने तक, कुछ खुशकिस्मत लोगों को 15 जड़ी मिल जाती है जबकि कुछ के हाथ खाली रह जाते हैं. नाकाम लोगों की नजरें अब अगले दिन पर रहती हैं. अगस्त के अंत तक इस जड़ी की तलाश पूरी हो चुकी होती है और फिर ग्रामीण दलालों के पास इसे लेकर पहुंचते हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी एक किलो की मात्रा 15 से 18 लाख के बीच बिकती है. इस कीड़ा जड़ी को ग्रामीणों से खरीदने वाले दलाल पहाड़ की दुर्गम यात्राओं से होकर इसे चीन और जापान की सीमा के भीतर पहुंचाते हैं, जहां ये और भी ऊंचे दामों पर बिकती है.
नायाब जड़ी: इस जड़ी को लेकर हाहाकार तब मचना शुरू हुआ जब 90 के दशक में स्टुअटगार्ड वर्ल्ड चैंपियनशिप में 1500 मीटर, 3 हजार मीटर और 10 हजार मीटर कैटिगरी में चीन की महिला धावकों ने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए शानदार प्रदर्शन किया. चीनी धावकों के ट्रेनर ने बाद में मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने ऐथलीट्स को यारशागुंबा का सेवन नियमित रूप से कराया है. बस इस बयान के बाद, जो फंगस कुछ साल पहले 4 लाख रुपये प्रति किलो के दाम पर बिकता था, उसकी कीमत दोगुने से भी ज्यादा हो गई. इस वक्त तो यह 15 से 18 लाख रुपये प्रति किलो के दाम पर बिकता है.
क्या है कीड़ा जड़ी?: हिमालय चिकित्सीय पौधों का स्थान हैं, यहां दुर्लभ पौधों की ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं जो और कहीं नहीं पाई जाती हैं. इन पौधों की दुर्लभता और उपचार करने की शक्ति की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ये बेहद ऊंची कीमत में बिकते हैं. ऐसा ही एक समृद्ध जैविक संसाधन कॉर्डीसेप्स सीनेंसिस है, जिसे स्थानीय लोग कीड़ा जड़ी के नाम से जानते हैं. यह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज कर सकता है, साथ ही ये नपुंसकता को भी मिटा देता है. इसी वजह से इसे हिमालयी वियाग्रा भी कहते हैं. इसे कैटरपिलर फंगस (अंग्रेजी) और यारशागुंबा (तिब्बती) के नाम से भी जाना जाता है.
क्या है यारशागुंबा?: आयुर्वेद में यारशागुंबा को जड़ी बूटी माना गया है. यह एक मृत कीड़ा होता है. हिमालयी वियाग्रा यारशागुंबा किसी तरह का बुरा प्रभाव यानी साइडिफेक्ट नहीं डालती है. वहीं, ऐसा देखा गया है कि अंग्रेजी वियाग्रा से दिल कमजोर हो जाता है. यारशागुंबा एक कीड़ा है. यह समुद्र तल से 3800 मीटर ऊंचाई पर पाया जाता है. इसकी मौजूदगी अभी तक हिमालय की पहाड़ियों में ही पाई गई है. इसकी थोड़ी मात्रा भारत और तिब्बत में पाई जाती है जबकि नेपाल में यह प्रचुर मात्रा में है. यह कीड़ा भूरे रंग का होता है और जड़ी के रूप में इसकी कुल लंबाई लगभग 2 इंच की रहती है. यह कीड़ा हिमालयी क्षेत्र में पनपने वाले कुछ विशेष किस्म के पौधों पर ही पैदा होते हैं.
स कीड़े की जीवनअवधि लगभग 6 माह की ही होती है. सर्दियों में पौधों के रस के रिसाव के साथ ही ये पैदा हो जाते हैं और मई-जून में बर्फ पिघलने के साथ ही अपना जीवन जक्र पूरा कर लेते हैं. मरकर ये कीड़े घास और पौधों में आकर बिखरते हैं.
क्यों मिला कीड़ा जड़ी नाम?: सामान्य तौर पर इसे आप एक जंगली मशरूम समझ सकते हैं. ये एक खास कीड़े (वैज्ञानिक नाम- कार्डिसेप्स साइनेसिस) की इल्लियों अर्थात कैटरपिलर्स को मारकर उसपर उगता है. जिस कीड़े के कैटरपिलर्स पर ये पनपता है उसका नाम हैपिलस फैब्रिकस है. क्योंकि ये आधा कीड़ा और आधा जड़ी रूप में होता है इसीलिए स्थानीय लोग इसे कीड़ा जड़ी कहते हैं. चीन और तिब्बत में इसे यारशागुंबा नाम से ही जाना जाता है.
बेहद मुश्किल है तलाशः 2009 में छपी बीबीसी की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि देहरादून के भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) की टीम ने इसपर रिसर्च की है. एफआरआई में कार्यरत तत्कालीन फॉरेस्ट पैथोलजी विभाग के प्रमुख ने बीबीसी को इस जड़ी से जुड़ी अहम जानकारियां दी थीं. उन्होंने बताया था कि ये जड़ी 3500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में मिलती है. 3500 मीटर की ऊंचाई पर ट्रीलाइन होती है यानी यहां के बाद पेड़ उगने बंद हो जाते हैं. मई से जुलाई के महीने में बर्फ पिघलने के साथ ही इनके पैदा होने का चक्र भी शुरू हो जाता है.
एफआरआई की टीम, जिसने इसपर रिचर्स की, उसे इसे तलाशने के लिए हिमालय के दुर्गम इलाकों में भटकना पड़ा था. टीम ने धारचूला से करीब 10 दिन की पैदल ट्रैकिंग की और उसके बाद वह उस जगह पहुंचे जहां यह मिलती है. वहां पर स्थानीय लोगों ने पहले से ही अड्डा जमाया हुआ था. इस जड़ी को लाने का काम वही लोग करते हैं जिनकी नजरें बेहद तेज होती हैं क्योंकि ये नरम घास के बिल्कुल अंदर तक छिपा होता है.